श्राद्ध/पितृ पक्ष – इस दिन करें, अगर नहीं है, दुनिया से चले गए अपने की तिथि..

हिन्दूधर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है, हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं, इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं।श्राद्ध हमारे पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का एक सनातन वैदिक संस्कार हैं। जिन पूर्वजों के कारण हम आज अस्तित्व में हैं,जिनसे गुण व कौशल , आदि हमें विरासत में मिलें हैं । उनका हम पर न चुकाये जा सकने वाला ऋण हैं। उन्होंने हमारे लिए हमारे जन्म के पूर्व ही व्यवस्था कर दी थी। वे हमारे पूर्वज पूजनीय हैं , उन्हें हम इस श्राद्ध पक्ष में स्मरण कर उनके प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वास्तव में, वे प्रतिदिन स्मरणीय हैं। श्राद्ध पक्ष विशेषतः उनके स्मरण हेतु निर्धारित किया गया हैं। इस धर्म मॆं, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया, जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं।

जिन लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि का पता नहीं होता उनके लिये भी श्राद्ध-पक्ष में कुछ विशेष तिथियाँ निर्धारित की गई हैं। इन तिथियों पर वे लोग पितरों के निमित श्राद्ध कर सकते है-

1. प्रतिपदा : इस तिथि को नाना-नानी के श्राद्ध के लिए सही बताया गया है। इस तिथि को श्राद्ध करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। यदि नाना-नानी के परिवार में कोई श्राद्ध करने वाला न हो और उनकी मृत्युतिथि याद न हो, तो आप इस दिन उनका श्राद्ध कर सकते हैं।

2. पंचमी : जिन लोगों की मृत्यु अविवाहित स्थिति में हुई हो, उनका श्राद्ध इस तिथि को किया जाना चाहिये।

3. नवमी : सौभाग्यवती यानि पति के रहते ही जिनकी मृत्यु हो गई हो, उन स्त्रियों का श्राद्ध नवमी को किया जाता है।
यह तिथि माता के श्राद्ध के लिए भी उत्तम मानी गई है। इसलिए इसे मातृ-नवमी भी कहते हैं। मान्यता है कि – इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।

4. एकादशी और द्वादशी : एकादशी में वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध करते हैं। अर्थात् इस तिथि को उन लोगों का श्राद्ध किए जाने का विधान है, जिन्होंने संन्यास लिया हो।

5. चतुर्दशी : इसतिथि में शस्त्र, आत्म-हत्या, विष और दुर्घटना यानि जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध किया जाता है। जबकि – बच्चों का श्राद्ध कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को करने के लिए कहा गया है।

6. सर्वपितृमोक्ष अमावस्या : किसी कारण से पितृपक्ष की अन्य तिथियों पर पितरों का श्राद्ध करने से चूक गये हैं या पितरों की तिथि याद नहीं है। तो इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्र अनुसार – इस दिन श्राद्ध करने से कुल के सभी पितरों का श्राद्ध हो जाता है। यही नहीं जिनका मरने पर संस्कार नहीं हुआ हो, उनका भी अमावस्या तिथि को ही श्राद्ध करना चाहिये।

7. बाकी तो जिनकी जो तिथि हो, श्राद्धपक्ष में उसी तिथि पर श्राद्ध करना चाहिये – यही उचित भी है। ।

विशेष :- श्राद्ध कर्म करने वालों को निम्न मंत्र तीन बार अवश्य पढ़ना चाहिए-

देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिश्च एव च।
नमः स्वधायै स्वाहायै नित्यमेव भवन्त्युत ।।
वायु पुराण ।

श्राद्ध सदैव दोपहर के समय ही करें। प्रातः एवं सायंकाल के समय श्राद्ध निषेध कहा गया है। हमारे धर्म-ग्रंथों में पितरों को देवताओं के समान संज्ञा दी गई है।

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