आज उत्तराखण्ड में नन्दा अष्टमी पर्व, जानें क्या है विशेष-

देहरादून/नैनीताल/चमोली। आज नन्दा अष्टमी के पर्व में जो उत्तराखण्ड देवभूमि के पहाड वासियों द्वारा जो हरियाली जमाया गयी होती है। जिसका महत्व इस संस्कृति विरासत को बचाने का प्रयास होता है। जिसे हम इस पर्व के रुप में बचाये हुये है। आज के इस दिन हम इस हरियाली को अपने ईष्ट भगवती,ओर दाणा पित्रों को चढ़ाते है। जिसमें रोट, हलवा, मक्का और घर की ककडी़ चढ़ाते है ओर उस प्रसाद को बाटते ओर ग्रहण करते है।

उत्तराखण्ड में पहाडवासी इस पर्व को मनाते है। जिसमें हरियाली जो नन्दा अष्टमी के रुप है, हर साल नन्दा अष्टमी पर अपने पित्ररों को इस पर्व में अपने घर मे खुश हाली लाने के लिये मनत मांगते है। जो उत्तराखण्ड देव भूमि के लोगों की मान्यता है।

माँ नन्दा अष्टमी के बारे में कहते है जहाँ पर सती के नयन गिरे थे, वहीं पर नैनादेवी के रुप में उमा अर्थात् नन्दा देवी का भव्य स्थान हो गया। आज का नैनीताल वही स्थान है, जहाँ पर उस देवी के नैन गिरे थे। नयनों की अप्पुधार ने यहाँ पर ताल का रुप ले लिया। तबसे निरन्तर यहाँ पर शिवपत्नी नन्दा (पार्वती) की पूजा नैनादेवी के रुप में होती है।

यह भी एक विशिष्ट उदाहरण है कि समस्त गढ़वाल – कुमाऊँ की एकमात्र इष्ट देवी ‘नन्दा’ ही है। इस पर्वतीय अंचल में नन्दा की पूजा और अर्चना जिस ढ़ंग से की जाती है — वह अन्यत्र देखने में नहीं आती।

नैनीताल ते ताल की बनावट भी देखें तो वह आँख की आकृति का ‘ताल’ है। इसके पौराणिक महत्व के कारण ही इस ताल की श्रेष्ठता बहुत आँकी जाती है। नैनी (नंदा) देवी की पूजा यहाँ पर पुराण युग से होती रही है।

कुमाऊँ के चन्द राजाओं की इष्ट देवी भी नन्दा ही थी, जिकी वे निरन्तर यहाँ आकर पूजा करते रहते थे। एक जनश्रुति ऐसी भी कही जाती है कि चंदवंशीय राजकुमारी ननद नन्दा थी जिसको एक देवी के रुप में पूजी जाने लगी। परन्तु इस कथा में कोई दम नहीं है, क्योंकी समस्त पर्वतीय अंचल में नन्दा को ही इष्ट देवी के रुप में स्वीकारा गया है।

गढ़वाल और कुमाऊँ के राजाओं की भी नन्दा देवी इष्ट रही है। गढ़वाल और कुमाऊँ की जनता के द्वारा प्रतिवर्ष नन्दा अष्टमी के दिन नंदापार्वती की विषेस पूजा होती है। नन्दा के मायके से ससुराल भेजने के लिए भी ‘नन्दा जात’ का आयोजन गढ़वाल – कुमाऊँ की जनता निरन्तर करती रही है। अतःनन्दापार्वती की पूजा – अर्चना के रुप में इस स्थान का महत्व युग – युगों से आंका गया है। यहाँ के लोग इसी रुप में नन्दा के ‘नैनीताल’ की मह्ता ज्यादा हो गई है।

अल्मोड़ा का नन्दा देवी मंदिर

जनपद चमोली के कडाकोटपट्टी के नो गांवों द्वारा प्रत्येक तीसरे साल आषाढ़ माह के नन्दा अष्टमी मे भारकोट बार भंगोटा में 3 दिनों का नन्दा देवी मेले का आयोजन किया जाता है। कुछ समय पहले यहाँ चोसठ (64) बली प्रथा थी लेकिन अब बली प्रथा बन्द होने से इस मेले को सात्विक ढंग से मनाया जाता है। तीन दिन के मेले मे पहले दिन कडाकोट पट्टी के आशा देव भूमियाल देवता को रैस से पूजा के बाद भारकोट मे लाया जाता है कहा जाता है कि जब भूमियाल देवता मन्दिर मैं पहुँचता है तब देवता खुद मन्दिर के कपाट खोलते है इसे दऊउगाड कहा जाता है। इस मेले मैं जागर की अहम भूमिका होती है। बरसों से जागर शैली की परम्परा आज भी जारी है। जिसमें महिलाओं का जागर मे विशेष सहयोग होता है। दूसरे दिन केली काटने (केले का पेड़ ) के लिए चोपता चौरी होते हुये तूनेडा गाँव जाते है ।तथा केली को लेकर भारकोट मन्दिर मे लाते है । जिस पर मां नंन्दा की मूर्ति बनायी जाती है रात को जागर सुवह तक लगते हैं। तीसरे दिन सुवह से ही मन्दिर में दूर दूर से दूर भक्तों की भीड माँ के दर्शन के लिए लगती है। दिन मे घोडा, हाथी कार्यक्रम किया जाता है । तथा शाम की माँ नन्दा को सारे भक्तगण खासतौर पर ध्याणियो और गांवो की महिलाओं द्वारा कैलाश को विदाई दी जाती है। इस अवसर पर सारी महिलाएँ व भक्तौ की आखो से आँसू रोके नही रूकते है। आज जैसे ही नंदा की डोली कैलाश के लिए रवाना हुयी सारी ध्याणिया और महिलाये फफक कर रोने लगी। और नंदा को कैलाश की ओर विदा किया। जब नंदा कैलाश को रवाना होती है तो बारिश भी शुरू हो जाती है। सदियो से ये परम्परा चली आ रही है। चौथे दिन महायज्ञ के साथ ब्रह्मभोजन के वाद भूमियाल देवता को मूल मन्दिर रैस भेज कर मेले को समापन होता है ।

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